top of page

जन्म कुंडली अध्ययन में गुरु और शुक्र के विषय में इनका ध्यान अवश्य रखना रहता है।

  • Pawan Dubey
  • Sep 25, 2023
  • 1 min read

जन्म कुंडली अध्ययन में गुरु और शुक्र के विषय में इनका ध्यान अवश्य रखना रहता है। इनको समझना होता है। कुंडली अध्ययन में यह बात सदैव ध्यान में रखें,कि शुक्र और गुरु जिस भाव में बैठे हैं। उससे एक घर आगे और उससे एक घर पीछे, दोनों ही भाव को यह विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। यही बात पूर्ण बली चंद्रमा पर भी लागू होती है। यदि चंद्रमा शुक्ल पक्ष के हैं ,और वह भी विशेष कर पूर्णिमा के आस-पास के हैं। तो ऐसे चंद्रमा भी है, ऐसा ही प्रभाव उत्पन्न करते हैं, एक घर आगे और एक घर पीछे, दोनों ही भाव को प्रभावित करते हैं। बाकी के सभी ग्रह जहां बैठते हैं। उससे पीछे वाले घर के रक्षक होते हैं। यानी छादक। देवगुरु बृहस्पति के बारे में यह बात सदैव ध्यान में रखनी होती है,कि यदि उनकी कोई राशि,वह जहां बैठे हैं,वह बात अलग है। यदि त्रिक भाव में है। अर्थात् 6,8,12 तो वह केवल पीछे वाले भाव के ही रक्षक बन पाते हैं। आगे वाले भाव की रक्षा नहीं कर पाते हैं।

 
 
 

Recent Posts

See All
जन्म कुंडली में शनि या राहु, कुंडली के तीसरे अथवा छठे स्थान पर हों,तो ऐसे जातक

जन्म कुंडली में शनि या राहु, कुंडली के तीसरे अथवा छठे स्थान पर हों,तो ऐसे जातक को भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पूर्वाभास होने लगता है।...

 
 
 
जन्म कुंडली में केंद्र और त्रिकोण में पाप ग्रह ना हों, लग्नेश और देवगुरु बृहस्पति केंद्र में स्थित

जन्म कुंडली में केंद्र और त्रिकोण में पाप ग्रह ना हों, लग्नेश और देवगुरु बृहस्पति केंद्र में स्थित हों, जरूरी नहीं है, कि युति में...

 
 
 
जन्म कुंडली में द्वितीय भाव का स्वामी बलवान हो, शुभ ग्रह से युत, अपनी स्वराशि या उच्च

जन्म कुंडली में द्वितीय भाव का स्वामी बलवान हो, शुभ ग्रह से युत, अपनी स्वराशि या उच्च राशि में हो, साथ ही साथ जन्म कुंडली में देवगुरु...

 
 
 

Comments


bottom of page