जन्म कुंडली में शनि देव द्वितीय भाव में हों, चतुर्थ में हों, नवम, दशम अथवा
जन्म कुंडली में शनि देव द्वितीय भाव में हों, चतुर्थ में हों, नवम, दशम अथवा एकादश भाव में हों, और ऐसे शनिदेव पर यदि देवगुरु बृहस्पति की दृष्टि हो। ऐसा संयोग जातक को सभी प्रकार के सुख को देने वाला,धन-धान्य से परिपूर्ण बना देता है। अब यह अलग बात है, कि द्वितीय और चतुर्थ भाव में शनि देव हों, एकादश एकादश और दशम भाव में यदि शनि देव हों, तो एकादश और दशम के शनि देव कार्यों को विलंबित करने वाले, द्वितीय और चतुर्थ के शनि देव के होने से, द्वितीय के शनिदेव थोड़ा झूठ बोलने की प्रवृत्ति जातक के अंदर ले आ देते हैं। और चतुर्थ के शनि देव से कार्यों में विलंब हो जाता है। माता के सुख में कमी आ जाती है। पर फिर भी ऐसा जातक धन-धान्य से परिपूर्ण आजीवन हर तरह के सुखों का भोक्ता होता है।

Comments